| वाराणसी। | |
| Story Update : Monday, October 24, 2011 1:57 AM | |
आने वाले सालों में भारत में तापमान इतना होगा कि लोग खुद को उबलता हुआ महसूस करने लगेंगे। वजह यह कि यहां के वायुमंडल में कार्बन डाई आक्साइड की मात्रा सीमा लांघ चुकी है। इसकेचलते धूप के चलते धरती से निकलने वाली विकिरणें अवशोषित हो जा रही है और वायुमंडल में नहीं जा रहीं। बीते सौ साल के तापमान के विश्लेषण में 0.40 डिग्री सेल्सियस तापमान बढ़ने की बात सामने आई है। बीते तीन दशक में अकेले यह बढ़ोत्तरी करीब 0.2 डिग्री सेल्सियस की रही। यही रेट रहा तो फिर वर्ष 2100 तक तापमान में तीन से चार डिग्री सेल्सियस की बढ़ोत्तरी हो सकती है। बीएचयू के भूभौतिकी विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर डा. ज्ञानप्रकाश सिंह के निर्देशन में जारी अहम शोध के क्रम में छात्र आरके मौर्या ने यह तथ्य पाए हैं। विश्लेषण में पाया गया कि बीते सौ साल में दिन का तापमान 0.65 जबकि रात का तापमान 0.40 डिग्री सेल्सियस बढ़ा है। देश के सात हिस्सों में बांटकर किए गए विश्लेषण में पाया गया कि इस दौरान तापमान सबसे ज्यादा पश्चिमी तट में 0.67 डिग्री सेल्सियस बढ़ा है जबकि सबसे कम उत्तर पश्चिम भारत में 0.07 डिग्री सेल्सियस ही बढ़ा है। इसी तरह पश्चिम हिमालय में 0.53, उत्तर मध्य भारत में 0.41, उत्तर पूर्व भारत में 0. 55, पूर्वी तट में 0.42 और इंटेरियल पेनिनसुएला में 0.45 डिग्री सेल्सियस तापमान बढ़ा है। वजहों की तलाश में डा. सिंह ने पाया है कि वायुमंडल में कार्बन डाई आक्साइड की मात्रा 380 पार्ट पर मिलियन बाइ वाल्यूम (पीपीएमवी) हो गई है जिसकी सीमा 280 पीपीएमवी ही है। यह बीते तीन दशकों में बढ़े वाहनों से निकलने वाले धुएं और बिजली उत्पादन के क्रम में उड़ने वाले कार्बन के चलते हुआ है। काफी कम पर अहम पहलू रेफ्रिजरेटर से निकलने वाले क्लोरो-फ्लोरो कार्बन भी हैं। ये ओजोन परत को क्षीण करने में लगे हैं। तत्काल राहत के लिए विकल्प वाहनों के यूरोपीय लेवल वाले या यूरो फोर स्तर वाले ईंधनों का प्रयोग हो। पेट्रोल या डीजल में निजी मुनाफेके लिए मिलावट पर पूरी तरह पाबंदी हो। मकानों पर सफेद रंग वाली पेटिंग कराएं, ये विकिरण को कम अवशोषित करते हैं। जनार्दन सिंह amar ujala compact |
Sunday, October 23, 2011
उबलने की ओर बढ़ रहा इंडिया
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उबलने की ओ
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